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बी. एन. राव : संविधान सभा में ब्रिटिश मानसिकता का प्रतिनिधि

बी. एन. राव : संविधान सभा में ब्रिटिश मानसिकता का प्रतिनिधि

बी. एन. राव : संविधान सभा में ब्रिटिश मानसिकता का प्रतिनिधि

बी. एन. राव : संविधान सभा में ब्रिटिश मानसिकता का प्रतिनिधि

       भारत की संविधान सभा का गठन 9 दिसंबर 1946 को हुआ यह वही ऐतिहासिक संस्था थी जिसने आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक स्वरूप की नींव रखी गई इस सभा में देश के कोने कोने से वे प्रतिनिधि शामिल थे जिन्होंने अपने समाज राज्य और विचारधारा की आवाज़ बनकर स्वतंत्र भारत का सपना देखा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. भीमराव अंबेडकर, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे अनेक नेता इस ऐतिहासिक यात्रा के निर्माणकर्ता बने किंतु इन्हीं राष्ट्रनिर्माताओं के बीच एक ऐसा व्यक्ति भी था, जिसकी निष्ठा और सोच स्वतंत्र भारत से अधिक ब्रिटिश शासन के अनुरूप थी वह व्यक्ति बी एन राव थे बी. एन. राव भारतीय सिविल सेवा (Indian Civil Service – ICS) के अधिकारी थे यह वही प्रशासनिक ढाँचा था जिसे अंग्रेज़ों ने भारत पर शासन करने के लिए तैयार किया था 1909 में आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद से लेकर 1953 तक उन्होंने विभिन्न प्रशासनिक पदों पर कार्य किया इस पूरी अवधि में उनकी पहचान ब्रिटिश शासन के विश्वस्त और अनुशासित अधिकारी के रूप में बनी रही राव का सोचने और कार्य करने का तरीका पूर्णतः औपनिवेशिक था वे कानून को ब्रिटिश व्यवस्था की दृष्टि से देखते थे जिसमें शासन का उद्देश्य जनता की सेवा नहीं, बल्कि नियंत्रण और व्यवस्था बनाए रखना था यही कारण था कि स्वतंत्रता के बाद भी वे मानसिक रूप से ब्रिटिश प्रशासनिक सोच से मुक्त नहीं हो पाए संविधान सभा में बी. एन. राव को संविधान सभा का संवैधानिक सलाहकार (Constitutional Adviser) नियुक्त किया गया था उनकी भूमिका तकनीकी रूप से मसौदा तैयार करने की थी परंतु वस्तुतः वे संविधान के प्रारूप और उसके प्रशासनिक ढाँचे पर गहरा प्रभाव रखते थे उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड के संविधानों का अध्ययन किया और उनसे प्रेरणा लेकर प्रारूप तैयार किया लेकिन यह अध्ययन भारतीय समाज की आवश्यकताओं की बजाय पश्चिमी और विशेषकर ब्रिटिश प्रशासनिक परंपरा की निरंतरता का प्रतीक बन गया उनके प्रारूप में नागरिक अधिकारों की जगह प्रशासनिक स्थिरता को प्राथमिकता दी गई थी यही कारण था कि डॉ.बी. आर. अंबेडकर और प्रारूप समिति को उनके मसौदे में अनेक परिवर्तन करने पड़े ताकि संविधान लोकतांत्रिक और जनोन्मुखी बन सके डॉ. भीमराव अंबेडकर का दृष्टिकोण सामाजिक न्याय, समानता और जनभागीदारी पर आधारित था वहीं बी. एन. राव का झुकाव प्रशासनिक दक्षता और कानून व्यवस्था की ब्रिटिश पद्धति की ओर था अंबेडकर ने जहां संविधान को जनता का दस्तावेज़ बनाने की कोशिश की, वहीं राव उसे शासन का उपकरण मानते थे कई बार डॉ. अंबेडकर ने बी. एन. राव के मसौदे में संशोधन करते हुए उसकी औपनिवेशिक छाया को कम करने का प्रयास किया यही वजह है कि संविधान का अंतिम स्वरूप लोकतंत्र समाजवाद और समानता के मूल्यों से परिपूर्ण बन पाया 1947 में जब भारत स्वतंत्रता की दहलीज़ पर था, बी. एन. राव को जम्मू-कश्मीर राज्य का दिवान (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया गया यह नियुक्ति ब्रिटिश नीति के अनुरूप थी क्योंकि उस समय महाराजा हरि सिंह ब्रिटिश प्रभाव में थे बी. एन. राव ने उस अवधि में कोई ऐसा निर्णय नहीं लिया जो कश्मीर को भारत की स्वतंत्रता की मुख्यधारा से जोड़ता उलटे उनके कदमों ने कश्मीर की स्थिति को और जटिल बना दिया उनकी प्राथमिकता कश्मीर की जनता नहीं, बल्कि ब्रिटिश नीतियों की रक्षा थी बी. एन. राव संविधान सभा में बैठकर भी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं हो सके उनकी सोच यह थी कि भारत जैसे विशाल देश में शासन का ढाँचा केंद्रीकृत और नौकरशाही-प्रधान होना चाहिए जबकि संविधान सभा के अधिकांश सदस्य विकेन्द्रित लोकतांत्रिक और जनता पर आधारित शासन प्रणाली के पक्षधर थे संविधान सभा के सभी सदस्य भारत के प्रतिनिधि थे लेकिन अकेले बी. एन. राव ब्रिटिश शासन की मानसिकता के प्रतिनिधि थे इतिहास में बी. एन. राव को एक कुशल विधिवेत्ता के रूप में स्वीकारा गया है, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि उन्होंने भारत के संविधान में ब्रिटिश प्रशासनिक ढाँचे की छाया बनाए रखने की कोशिश की यदि डॉ. अंबेडकर और अन्य सदस्यों ने उनके प्रारूप में संशोधन न किया होता तो आज का भारतीय संविधान संभवतः जनसत्ता की बजाय नौकरशाही प्रधान बन जाता बी. एन. राव की भूमिका तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण थी लेकिन वैचारिक दृष्टि से वे औपनिवेशिक सोच के प्रतीक थे वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जो स्वतंत्र भारत की नींव रखते हुए भी ब्रिटिश शासन की छाया से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई संविधान सभा ने जहां स्वतंत्र भारत का स्वप्न साकार किया वहीं बी. एन. राव ने अनजाने में उस स्वप्न में औपनिवेशिक रंग मिला दिया इसलिए इतिहास के न्यायालय में उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है जो स्वतंत्र भारत की संविधान सभा में बैठा परंतु सोच अब भी ब्रिटिश राज की भाषा में करता रहा।

सन्दीप यदुवंशी
राष्ट्रीय सचिव/प्रभारी मुंबई/महाराष्ट्र
गुजरात, दमन दीव एवं दादरा नगर हवेली
समाजवादी अधिवक्ता सभा
विशेष अमंत्रित सदस्य
समाजवादी पार्टी, मुंबई प्रदेश

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