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समलैंगिक संघियों के विरोध के बावजूद डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरने संविधान लिखा, बनाया और शिल्पकार भी बने…….!
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का विरोध और मुकाबला करना संघियों के लिये मुश्किल ही नहीं ना मुमकीन भी है.....!
लोकसभा चुनाव मे बहुमत से सरकार स्थापन करने मे असफलता मिलने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक ऊर्फ समलैंगिक संघने अपनी चाल बदल दी है. संविधान, लोकतंत्र भारतीय जन मानस का एक अभिन्न अंग बना हुआ है. ये संघ के समज मे लोकसभा चुनाव के नतिजों के बाद आया आया. तो समलैंगिक संघ ने संविधान बदलने के अजेंडेपर कायम रहते हुये, संविधान का निर्माता बदलने की मोहिम सुरू की. आज सोशल मिडियापर समलैंगिक संघ, भाजप, अंधभक्तों की फौज और उनका आयटी सेल संविधान निर्माता बदलने का अजेंडा चला रहा है. इससे यह साफ हो गया है की, समलैंगिक संघ को संविधान से तो नफरत थी ही, संविधान के निर्माता भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर से भी नफरत थी. समलैंगिक संघ और सावरकर का आंबेडकर विरोध कभी छुपा नहीं है. डॉ . आंबेडकर के देश निर्माण के हर कार्य का विरोध समलैंगिक संघ और सावरकरने किया. अपने विरोध के बावजूद डॉ. आंबेडकर देश निर्माण के कार्य को गती दे रहे थे. भारतरत्न डॉ. आंबेडकर का मुकाबला करना केवल मुश्किल नहीं, ना मुमकीन है, उसका अनुभव समलैंगिक संघ को बार बार आया है.
समलिंगिक संघ, सावरकर और विश्वहिंदु परिषद के नेता संविधान के विरोध मे हमेशा खडे है. उनका विरोध इसलिये था और है की, एक दलित व्यक्ती संविधान सभा के ड्राफ्टींग कमिटी का अध्यक्ष और फिर संविधान का निर्माता बना है. और एक महत्त्वपूर्ण बात डॉ. आंबेडकर का लिखा संविधान समानता, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता की केवल बात ही नहीं करता, संविधान का मूल गाभा भी यही है. और ये सामाजिक न्याय, समानता और धर्मनिरपेक्षतावाली बात हिंदू राष्ट्र निर्माण की संकल्पना को ही गाढ देती है. ब्राह्मणी, वैदिक, मनुवादी विषमता, जाती व्यवस्था को आरोपी के पिंजरे मे खडा कर देती है. इसालिये संविधान और संविधान निर्माता भारतरत्न डॉ. आंबेडकर का विरोध ये समलैंगिक संघी शक्तीया कर रही है.
संविधान सभा मे कितने सदस्य होने दे, पर ये संविधान जब समानता, सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता की बात करता है, तो यह संविधान केवल डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का है. उन्होंने लिखा है. वो ही उसके निर्माता, शिल्पकार है. उसमे कोई शक नहीं. अब संविधान के शिल्पकार के बारे मे देशभर मे जो माहोल धर्मांध विचारों की शक्तिया तयार कर रही है और बी. एन. राव को संविधान के शिल्पकार के रूप मे प्रोजेक्ट कर रही है, उस बी. एन. राव को डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व मे संविधान बन रहा था , तब उनकी सेवा मे रखा गया था. समानता, सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता जैसी बाते, विचारों से बी. एन. राव कोसो मिल दूर थे. और सामाजिक न्याय की बात करे तो, ब्राह्मणों चरित्र ही कभी न्यायिक रहा नहीं, यह पुरी दुनिया जानती है.
ब्राह्मणों मे समानता का अभाव, और ये जाती सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता के विरोधी होने के कारण उन्हे ब्रिटिश सरकार के सत्ताकाल मे न्यायाधीश नहीं बनाया जाता था . ऐसा ब्रिटिश सरकार का फर्मान था. ऐसी स्थिती मे कोई ब्राह्मण समानता, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता ही मुख्य आत्मा होनेवाला संविधान कैसे लिख सकता है. इसलिये समलैंगिक संघी संविधान निर्मातावाली जो मोहिम एक अजेंडे के तहत चला रहे है, यह लोकसभा चुनाव मे हार के बाद संविधान बदलने मे जो विफलता मिली, उसका नतिजा है. देश की पुरी ब्राह्मण जाती एकजूट होकर भी अकेले डॉ. आंबेडकर का मुकाबला नहीं कर सकते, यह विधान १९३५ मे पंडित मदनमोहन मालवीयने किया था. पंडित मालवीय एक ब्राह्मण और कट्टर ब्राह्मण थे, पर वो डॉ. आंबेडकर को जानते थे.
फेक मोहिम, अजेंडा से समाज को भ्रमित किया सकता है, यह समलैंगिक संघ जानता है. केवल एक बार नहीं 13 बार माफी मांगनेवाले विनायक दामोदर सावरकर को ” स्वातंत्र्यवीर सावरकर ” इस समलैंगिक संघियोंने ही बनाया था. इतने कमाल का ये संघटन है. और इस संघटन का चरित्र गुलामी का रहा है. उनकी विचारधारा गुलाम मानसिकता की हमेशा रही है. जब देश मे मुगल आक्रमणकारी आये, तो उनकी गुलामी की, वो गये और ब्रिटिश आये, तो उनकी गुलामी की. गुलामी का चरित्र रहा है इस समलैंगिक संघीयों का.

सारा विश्व जानता है की डॉ. आंबेडकर सिम्बॉल ऑफ नॉलेज है……! संघी चिलाते है तो चिलाने दो….!
संघ के स्थापना के सौ साल पुरे होने के अवसरपर देश का स्वातंत्र, समता और धर्म निरपेक्षता का मूल गाभावाला संविधान बदलकर मनुस्मृती का विधान लागू करने का सपना संघियों का था. पर देश की जनता ने लोकसभा चुनाव मे संघीयों को उनकी औकात दिखाई और सपना तूट गियर. तब से संघ बोखलाया है. और अपना संविधान और आंबेडकर विरोधी अजेंडा अन्य मार्ग से अंमल मे लाने का प्रयास कर रहा है. लेकीन इस बार भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर से पंगा ले रहे है. उसके परिणाम भी उन्हे भुगतने पडेगे.
संविधान सभा और बी. एन. राव का संबंध सच मे कुछ रहा है क्या ? तो उसका जबाब हा मे है. राव संविधान सभा के सल्लाहकार थे. वो ब्रिटिशों के नोकर थे. इस कार्य मे उन्हे क्यू सामिल किया गया ? उसका कुछ पता नहीं. डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व और अध्यक्षतावाले संविधान सभा ने संविधान का draft बनाया. कलम बनाये. उसपे कई बार घंटोघंटा चर्चा हुई. तगडी बहस हुयी. संविधान सभा मे अनुच्छेद के प्रारूप तयार किये जाते थे, लोक नियुक्त सदस्य उसपे चर्चा करते थे. बी. एन. राव कही नहीं थे. वो सदस्य भी नहीं थे. सारा रेकॉर्ड उपलब्ध है. तो भी संघी ये मोहिम चला रहे है. उसके पिछे केवल संविधान और डॉ. आंबेडकर का विरोध ये एक मात्र सूत्र है.
रही बात भारतरत्न डॉ. आंबेडकर की तो सारा विश्व जानता है की, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर विश्व के जादा पढे, लिखे, विद्वान थे. डॉ. आंबेडकर को पुरे विश्व मे सिम्बॉल ऑफ नॉलेज कहा जाता है. पुरी दुनिया मे उनकी प्रतिमाये लगी है, और वो प्रतिमा पुरे विश्व को सामाजिक न्याय और समानता का संदेश देती है. अब चायना डॉ. आंबेडकर का दुनिया का सबसे बडा स्मारक चायना मे बना रहा है. वहा एक हजार फूट की उंच डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा खडी की, जायेंगी और उस प्रतिमा मे डॉ. आंबेडकर के हात मे यह संविधान रहेगा. जिसके शिल्पकार, निर्माता वो खुद्द है. और ये प्रतिमा दुनिया को सामाजिक न्याय, समानता और स्वातंत्र्य का संदेश देती रहेगी. दुनिया डॉ. आंबेडकर को सलाम कर रही है. गोबर भक्तों की पर्वा कोन क्यू करेगा…. ! चिलाते है, तो चिलाने दो…! मनुस्मृती…उनका विधान डॉ. आंबेडकर ने पहिले जलाया, फिर गाडा, तो ये चिलायेगे जरूर चिलाने दो…..!
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राहुल गायकवाड,
प्रवक्ता, महासचिव समाजवादी पार्टी,
महाराष्ट्र प्रदेश