हम ठोकरों में रखेंगे मनुवाद को,
जहां, इज्जत पैसे बांटने से मिलती है,
हम बाग़ी रहेंगे उन महफ़िलों में,
जहाँ शोहरत तलवे चाटने से मिलती है..!
हमें पहचान दरबारों में नहीं,
सड़कों की आग में मिलती है,
जो रीढ़ बेच दें सत्ता के आगे,
उन्हें इज़्ज़त भीख में मिलती है।
हम झुकते नहीं मंदिरों–महलों में,
हमें ताक़त सवाल उठाने से मिलती है,
जो देवता गढ़ते हैं गुलामी के,
उन्हें श्रद्धा अंधेपन से मिलती है।
हमें सीख पुराणों से नहीं,
संविधान की धार से मिलती है,
हमारी नसों में मनुस्मृति नहीं,
बाबासाहेब की विचारधारा बहती है।
जो जाति को गंगा समझ पीते हैं,
उन्हें शांति बहाने से मिलती है,
हम उसी गंगा में सवाल घोलतें है,
क्योंकि मुक्ति टकराने से मिलती है।
मंच तुम्हारे, माइक तुम्हारे,
अख़बारों में तुम्हारी चलती है,
हमें इतिहास में जगह मगर
लिखने और लड़ने से मिलती है।
बुद्ध की करुणा सीने में है,
भीम की आग मुट्ठी में जलती है,
जो इसे कमज़ोरी समझ बैठे,
उसे याद रहे,
करुणा जब विद्रोह बने,
तो सत्ता राख में बदलती है।
हम बाग़ी हैं हर उस दौर में,
जहाँ ज़िंदा रहने की क़ीमत चुप्पी से मिलती है,
हम झुकेंगे नहीं,क्योंकि हमें इंसान होने की पहचान,
आंबेडकरवाद से मिलती है..!संविधान से मिलती है….!!
कांबलेसर बदलापुर