- 19
- 1 minute read
भारतीय करंसी पर से गांधी चित्र हटे या बचे : एक संशोधनात्मक चिकित्सा !*
3waysmediadmin
February 2, 2024
Post Views: 39
भारतीय करंसी पर से गांधी चित्र हटे या बचे : एक संशोधनात्मक चिकित्सा
ब्रिटिश गुलाम भारत का “१५ अगस्त १९४७” को आझाद होना, वही २६ जनवरी १९५० को “संविधान संस्कृति” में बांधे रखा जाना कहे, या “भारत का प्रजासत्ताक” हो जाना कहे, या बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इन्होने “भारतीय संविधान” को अंमल करना भी कहे, इन ऐतिहासिक घटनाओं के बिच ही, “भारतीय करंसी” (नोट) इस में, कही बदलाव भी दिखाई देते है. सन १९४९ में करंसी पर, “ब्रिटीश राजा” का प्रतिक चिन्ह हटाकर, भारतीय राष्ट्रीय चिन्ह “अशोक स्तंभ” विराजित रहा था. आगे जाकर सन १९६९ में, राष्ट्रिय चिन्ह*”अशोक चिह” इस का साईज छोटा कर, “मोहनदास गांधी” को शामिल किया गया. साथ ही “विज्ञान, प्रगति, सांस्कृतिक विरासत” (कोणार्क मंदिर, सांची स्तुप, हम्पी) आदि प्रतिक करंसी पर दिखाई देते है. “सुरक्षा सुविधाओं” में वृध्दी हुयी. रू. २०००/- करंसी का, विमुद्रीकरण, नए रूप में गांधी जी की “न्यु सिरीज” सन २०१६ में, रंगिन करंसी और छोटे करंसी का प्रचलन बढा. इसके पहले भारतीय करंसी रू. १०००/-, रु. ५०००/-, रु. १०००० यह सन १९७८ बंद कर दी गयी थी. उस करंसी पर “अशोक स्तंभ” इसके साथ “तंजौर मंदिर, गेट वे ऑफ इंडिया” यह सांस्कृतिक विरासत विराजमान थी. नरेंद्र मोदी सरकार ने रु २००० करंसी पर, “अंतरिक्ष यान, स्वच्छ भारत” लाने के बाद सन २०२३ में, रु. २०००/- करंसी का चलन भी बंद कर दिया था. करंसी पर “आर्थिक विकास की पहचान” देने का भी प्रयास, दिखाई देता है.
अभी अभी भाजपाई नेता नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा “मनरेगा” (महात्मा गांधी रोजगार हमी योजना) का नाम बदलकर, “विकसित भारत – जी रामजी कानुन” को, संसद की भी मोहर लगा दी. कांग्रेस दल ये केवल देखता ही रह गया. अब कांग्रेस ५ जनवरी २०२६ से “देशव्यापी आंदोलन” चलाने जा रही है. कांग्रेस ने भी उनके सत्ता राज में, “क्या क्या बदलाव नहीं किये ?” अंतरदेशिय पत्र / पोष्ट कार्ड इस पर का “सम्राट अशोक राजमुद्रा” हटाकर, अंतरदेशिय पर “मोर” तथा पोष्ट कार्ड पर “वाघ” प्रतिक चिन्ह बिठा दिया. सन १९४९ में भारतीय करंसी पर “ब्रिटिश राजा” प्रतिक को हटाकर, “सम्राट अशोक मुद्रा” प्रतिक चिन्ह लांना, यह भारत आझाद होना हम समझ सकते हैं. परंतु सन १९६९ में भारत का राष्ट्रिय चिन्ह “चक्रवर्ती सम्राट अशोक मुद्रा” इस को बहुत ही छोटा कर, “मोहनदास गांधी” इनको बहुत बडा कर दिया था. यह कांग्रेस का अपने देश के “प्रतिक चिन्ह” की बडी तोहिम की थी. कांग्रेस दल भी उसी तरह आगे “सिकुडता” चला गया. कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में, “सम्राट अशोक की जयंती” सरकारी तौर पर मनाने की कोई चेष्टा ही नहीं की. यह कांग्रेस दल का दुसरा पाप था. क्यौं कि, “प्राचिन भारत का इतिहास” यह चक्रवर्ती सम्राट अशोक की धरोहर है. कांग्रेस दल अपने “धरोहर नायक की तोहिम” की है. जो माफी के काबिल बिलकुल ही नहीं है. वही बात “भाजपा शासन” काल में अविरत चालु है. भाजपा दल ने भी कांग्रेस सत्ता शासन की गलतीयां सुधारने की, कोई चेष्टा नहीं की है. अत: भाजपा का हश्र भी भविष्य में “सिकुडना” तय है. बुध्द इसलिए कहते है – “सब्ब पापस्य अकरणं, कुसलस्स उपसंपदा | सचित्तपरियोदपनं, एतं बुध्दान सासनं (अर्थात – सभी पापों को ना करना, कुशल कर्म करना, तथा स्वयं के मन (चित्त) को परिशुध्द करना, यही बुध्द की शिक्षा है. यही बुध्द का शासन है.) “धम्मपद” के पाप वग्गो में बहुतसी गाथा है, मैं केवल एक का संदर्भ देता हुं – “पापोपि पस्सति भद्रं याव पापं न पच्चति | यदा च पच्चति पापं अथ पापो पापानि पस्सति ||” (अर्थात – जब तक पाप का परिणाम सामने नहीं आता, तब तक पाप भी अच्छा लगता है. जब पाप अपना परिणाम देना शुरु करेगा, तब पापी को समझ में आयेगा कि मैने यह क्या कर दिया.) बुध्द “क्षमा याचना” भी बताते है – “ओकास वन्दामि भंते ! द्वारतेन मया कत्तं सब्बं अच्चयोखमथ मे भन्ते !” दुतियम्पि…!! ततियम्पि…!!! (अर्थात – अवकाश दिजिए भन्ते ! काय, वाचा, मन से, जो मुझ से अपराध हुये होंगे, वह सब क्षमा कीजिए भन्ते ! दुसरी बार… तिसरी बार…) उपासक के उस याचना पर भन्तेजी भी कहते है – “खमामि, खमामि, खमामि !” (अर्थात – क्षमा किया, क्षमा किया, क्षमा किया.) परंतु जो पाप करने का आदी हो, या जान बुझकर या जानकर भी जो पाप करता हो, उसे क्या कहे ? परिणाम तो भोगना होता है. और क्षमा करने के लिये भन्ते भी उसी योग्यता प्राप्त हो !
भाजपा नरेंद्र मोदी सत्ताराज में, मनरेगा योजना” बंद होना, “जी रामजी योजना” शुरु हो जाना, “महात्मा गांधी ” नाम की योजना बंद होने से, गांधी के नाम पर कांग्रेस की बौखलाहट ने, भारतीय करंसी पर “मोहनदास गांधी यह प्रतिक हटाने की भी चर्चा, कांग्रेस दल की ओर से होने लगी है. यहां प्रश्न खडा होता है, “राष्ट्रिय मुद्रा यह बडी कि मोहनदास गांधी बडे है ?”निश्चित ही “राष्ट्रिय मुद्रा” यह राष्ट्र का प्रतिक है, वह बडी है. *”राष्ट्र की पहचान” है. अगर कांग्रेस शासन द्वारा “राष्ट्रिय मुद्रा” इस प्रतिक चिन्ह को छोटा करना, और “गांधी को बडा करना” यह “प्रतिक चिन्ह के अपमान” साथ साथ, देश की “गरिमा को गिराना” है. वही हम “भारत के आजादी” का जब संदर्भ देखते है, तब “गांधी और कांग्रेस नीति के कारण, भारत देश को आझादी “३ – ४ साल देरी” से मिली है. आज वह विषय औचित्य नहीं है. करंसी पर गांधी आने से, “भारतीय करंसी का मुल्य बढा” नहीं है. बल्की भारतीय करंसी का मुल्य यह डॉलर की तुलना में, यह उत्तरोत्तर गिरते ही आया है. गांधी प्रतिक से करंसी मुल्य बढा नहीं है. फिर “भारतीय करंसी से गांधी हटे या बचे ?” यह कोई मायने नहीं रखता. भारतीय करंसी का इतिहास बहुत लंबा है. सन १९५० – ६० काल में, करंसी पर राष्ट्रिय मुद्रा “सम्राट अशोक के सिंह” प्रतिक के साथ, प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर थी. सन १९७० में खेती वाडी, चार की पत्तीया चुननेवाली कृषी गतिविधिया दिखाई देती थी. सन १९८० में वैज्ञानिक उन्नती और आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, सैटेलाईट, हिराकुंड डॅम यह प्रतिक रहे थे. “सन २०१६ में नोटबंदी के बाद गांधी सिरिज,” भाजपा सरकार ने जारी किये. “क्या गांधी सिरिज से करंसी मुल्य में, डॉलर तुलना में कोई वृध्दी हुयी ?” यह प्रश्न है. दुसरा अहं विषय यह कि, “गांधी यह सर्वमान्य नेता है क्या ?” भारत के कोई भी नेता ये “सर्वमान्य नेता” नहीं है. ना हि कोई देव – देवताएं ! फिर वह प्रयोग कभी भी टालना योग्य है. और करंसी पर केवल “राष्ट्रिय प्रतिक – सम्राट अशोक चार दिशोओं पर दहाड लगानेवाला सिंह” ही विराजित होना चाहिए. सभी विवादों का अंत हो जाएगा. “नोट / करंसी डिझाईन” करने वाले, रिझर्व्ह बँक के “करंसी मॅनेजमेंट विभाग” डिझाईन कर्ता भी बिन-अकल ही दिखाई देते है. सदर डिझाईन बनाने के बाद “रिझर्व्ह बँक तथा केंद्र सरकार” की मंजुरी यह “RBI अधिनियम १९३४ धारा २५” का उचित प्रयोग करता है या नहीं ? यह भी प्रश्न है. “रिझर्व्ह बँक यह करंसी की डिझाईन बदल भी सकता है.” और केंद्र सरकार यह केवल करंसी संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय की शिफारस को मानता है.अत: अपने देश के “विकास प्रति” चिंतित ना होकर, इस प्रकार के विवाद को, हम क्या कहे ? आज कोई गांधी प्रतिक देश के करंसी का मुल्य बढानेवाला नहीं है. हमे तो चिंता, करंसी मुल्य डॉलर तुलना में बढाने में होनी चाहिए !
डॉ मिलिन्द जीवने
0Shares