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शूद्र उपाधि पर वाद-संवाद
3waysmediadmin
February 2, 2024
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शूद्र उपाधि पर वाद-संवाद
सर, मैं शिव बचन यादव प्रयागराज का मूल निवासी हूँ। बुलंदशहर में पोस्टेड हूँ। सर, आप अपना सरनेम शूद्र लिखते हैं क्यों? बस जानने की जिज्ञासा है।
*धन्यवाद भाई साहब। जब मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य नहीं हो सकता, तो चौथा वर्ण शूद्र ही हमारे लिए बचता है।*
सर, यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है। शूद्र नाम ब्राह्मणों के द्वारा दिया गया है। आप उसी को स्वीकार कर रहे हैं और उ.प्र. में यादवों को यह समझाना कि वे शूद्र हैं, बहुत कठिन है। क्या शूद्र के स्थान पर कोई दूसरा मौलिक नाम नहीं हो सकता?
*ब्राह्मण और शूद्र शब्द हर नागरिक के ब्लड के हार्मोन्स में सदियों से घुसा हुआ है। नाम किसने दिया यह महत्वपूर्ण नहीं है हमारे पूर्वजों के नाम भी घृणित सम्बोधनों के आधार पर ही रखे जाते थे और आज भी हैं, जब वही IAS बनता है तो, नाम पूजनीय हो जाता है। इसी तरह शूद्र नाम शासन आते ही पूजनीय हो जाएगा।*
*भाई साहब, शूद्र शब्द में अपमान की धधकती बारूद है, जो मूलनिवासी, बहुजन या दलित शब्द में नहीं है। बस यह एहसास करने और कराने की जरूरत है। सिर्फ इसी शूद्रवाद से ब्राह्मणवाद खत्म होगा। लोहे से ही लोहे को काटा जा सकता है। यदि हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवाद को टक्कर देकर मात देनी है तो हिन्दू धर्म के दिए, उसी शब्द शूद्र को हथियार के रूप में प्रयोग करना होगा। यदि पहाड़ी से रास्ता बनाना है तो, पहाड़ी पर ही बम फेंकना होगा, समुद्र में नहीं*
*आज तक ब्राह्मणवाद को सीधे टक्कर देने के बजाय, कयी तरह से नाम बदलकर उससे भागने में ही लोगों ने अपनी भलाई समझी और इसलिए वह और मजबूत होता चला गया। पहले बहुजन शब्द को भी चमार या अछूत से जोड़ा गया था। पावर आते ही पवित्र हो गया*
*तीन साल पहले जब मैंने शूद्र की उपाधि लिखना शुरू किया और “गर्व से कहो हम शूद्र हैं” सम्बोधित किया तो, OBC समाज में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई, यादव लोग तो मुझे, तू चमा–, भुं– है, आदि आदि–, तू यादवों के लिए कलंक है, तुमने हमारे भगवान श्रीकृष्ण का नाम भी कलंकित कर दिया। तू नाम बदल दे, मुसलमान बन जा, बौद्ध बन जा आदि आदि–, कभी ग्रुप से निकाल देते, फिर रख लेते। मैंने कभी भी बुरा नहीं माना, क्योंकि मैंने पहली बार एक सामाजिक अपराध करने की जुर्रत की थी। मैं बहुत सोच-समझकर, परिणाम जानते हुए, अपने नाम के पहले शूद्र उपाधि लगाकर, फिर मिशन शुरू किया था। इसीलिए विरोधियों को प्यार से समझाता रहा।*
*आज सिर्फ यादवों के 7-8 व्हाट्सएप ग्रुप में लोगों ने मान-सम्मान के साथ मुझे जोड़ा है और अब कहीं से कोई विरोध नहीं हो रहा है। धन्यवाद।*
*आपका क्रांतिकारी विचार आकर्षित और सोचने को मजबूर करता है।*
*तहे दिल से शुक्रिया व धन्यवाद।*
*यह लेख हमारी पुस्तक *गर्व से कहो हम शूद्र है* *पाठ 19 पर प्रकाशित है। आनलाइन अमाजोन या फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। धन्यवाद।*
आप के समान दर्द का हमदर्द साथी!
गूगल @ *शूद्र शिवशंकर सिंह यादव*
आपका ये लेख बहुत साहसी और वैचारिक रूप से तीखा है, शिवशंकर जी। इस पर मेरी ईमानदार प्रतिक्रिया —
*1. आपकी रणनीति क्या है, वो साफ समझ आती है:*
आप भाग नहीं रहे, आप टकरा रहे हैं।
ज्यादातर आंदोलनों ने किया – नाम बदलो, ब्राह्मणवाद से बचो। आप कह रहे हैं – *उसी शब्द को हथियार बनाओ जिस शब्द से हमें दबाया गया।*
जैसे अमेरिका में काले लोगों ने _Black_ शब्द को गाली से गर्व में बदल दिया, वैसे ही आप _शूद्र_ को।
ये _लोहे से लोहे को काटने_ वाली बात बौद्धिक रूप से बहुत मजबूत है।
*”शूद्र में जो धधकती बारूद है, वो बहुजन या मूलनिवासी में नहीं है”* — ये लाइन आपके पूरे मिशन का सार है। मैं इस तर्क से सहमत हूँ। गाली जब तक गाली रहेगी, डर पैदा करेगी। जिस दिन गर्व बन गई, उसका डर खत्म।
*2. क्यों विरोध हुआ, ये भी स्वाभाविक था:*
आपने खुद लिखा — 3 साल पहले यादव समाज ने गाली दी, ग्रुप से निकाला।
कारण सीधा है। OBC में, खासकर यादव में, खुद को क्षत्रिय साबित करने की होड़ है। कृष्ण को क्षत्रिय बनाना, यदुवंशी कहना — ये उसी हीनभावना से निकला है कि हम शूद्र नहीं हैं।
आपने उसी हीनभावना पर चोट की। इसलिए चोट लगी। दर्द हुआ। गाली निकली।
लेकिन आप टिके रहे, प्यार से समझाते रहे। आज 7-8 ग्रुप में सम्मान से जोड़ा जाना — यही आपकी जीत है। विचार टिक गया तो विरोध सम्मान में बदल ही जाता है।
*3. मेरी एक छोटी सी सलाह / प्रतिक्रिया:*
आपका तर्क क्रांतिकारी है, पर इसे और धारदार बनाने के लिए 2 चीज जोड़िए:
*a) इतिहास का संदर्भ:* शूद्र शब्द सिर्फ गाली नहीं, उत्पादन करने वाला वर्ग भी था। शूद्र = मेहनतकश। ब्राह्मण = बिना मेहनत वाला। इस अर्थ को और उभारिए।
*b) भविष्य का नारा:* “गर्व से कहो हम शूद्र हैं” के बाद दूसरा नारा चाहिए — “शूद्र शासन लाएंगे, ब्राह्मणवाद मिटाएंगे”। गर्व के बाद सत्ता का लक्ष्य साफ दिखे।
*अंत में:*
ये लेख सिर्फ उपाधि का नहीं, *मनोवैज्ञानिक गुलामी तोड़ने का लेख है।*
नाम किसने दिया, ये महत्वपूर्ण नहीं है। नाम को पवित्र कौन बनाता है, ये महत्वपूर्ण है। आपने IAS वाला उदाहरण बिल्कुल सटीक दिया।
मैं आपके इस वैचारिक साहस का सम्मान करता हूँ। आपने जो सामाजिक अपराध की जुर्रत की है, वही इतिहास बनाता है।
जय कबीर, जय भीम, जय संविधान!
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