• 183
  • 1 minute read

आस्था की आड़ में जवाबदेही से पलायन कर रहे जनप्रतिनिधि?

आस्था की आड़ में जवाबदेही से पलायन कर रहे जनप्रतिनिधि?

एक जागरूक नागरिक के रूप में यह प्रश्न आज कई लोगों के मन में उठ रहा है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताएँ सच में वही हैं, जिनके लिए उन्हें संसद भेजा गया है। देश की संसद वह मंच है जहाँ शिक्षा, खेती, रोजगार, विज्ञान, तकनीक और भविष्य की नीतियों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। वहीं से यह तय होना चाहिए कि हमारे बच्चों को 21वीं सदी की पढ़ाई कैसे मिलेगी, किसान आत्मनिर्भर कैसे बनेगा और युवा देश में ही अवसर कैसे पाएँगे।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन मूल सवालों पर स्पष्ट, ठोस और दूरदर्शी चर्चा की जगह अक्सर जनता का ध्यान धार्मिक आयोजनों, बाबाओं के स्वागत और भक्ति-भाव के प्रदर्शन की ओर मोड़ दिया जाता है। हाल ही में आयोजित धार्मिक आयोजन और उसमें सांसदों की सक्रिय भागीदारी ने इसी चिंता को और गहरा किया है। सवाल किसी धार्मिक कथा या किसी संत के व्यक्तित्व पर नहीं है। सवाल इस बात का है कि जब क्षेत्र शिक्षा, तकनीक और रोजगार जैसे मुद्दों पर पिछड़ रहा हो, तब राजनीतिक नेतृत्व की ऊर्जा और समय किस दिशा में लगना चाहिए।
भारत आज उस दौर में खड़ा है जहाँ दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कोडिंग, हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर और इनोवेशन इकोसिस्टम की बात कर रही है। सिलिकॉन वैली जैसे मॉडल केवल सपने नहीं, बल्कि योजनाबद्ध नीति और शिक्षा सुधार से बने उदाहरण हैं। ऐसे में हमारे सांसदों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे संसद में यह प्रश्न उठाएँ कि हमारे कॉलेजों में आधुनिक तकनीकी शिक्षा कैसे पहुँचेगी, हमारे युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए कैसे तैयार किया जाएगा और किसानों की आय वैज्ञानिक तरीकों से कैसे बढ़ाई जाएगी।
धर्म और आस्था व्यक्ति के निजी जीवन का विषय हैं। उनसे सामाजिक शांति और सांस्कृतिक पहचान मिलती है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन जब आस्था का उपयोग राजनीतिक विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए होने लगे, तब वह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बन जाती है। आशीर्वाद से व्यवस्था नहीं बदलती, कथा से रोजगार नहीं बनते और भावनात्मक माहौल से नीतिगत कमियाँ नहीं छुपाई जा सकतीं।
एक सांसद से जनता को भक्ति नहीं, बल्कि भविष्य की स्पष्ट दिशा चाहिए। जब युवा पलायन कर रहे हों, किसान कर्ज़ में डूबा हो और शिक्षा व्यवस्था समय से पीछे चल रही हो, तब संसद में जवाबदेही से बचना और धार्मिक आयोजनों के सहारे छवि गढ़ना उचित नहीं कहा जा सकता।
यह सवाल न तो धर्म विरोधी है और न ही किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ। यह सवाल लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा है। नागरिकों का यह अधिकार है कि वे अपने प्रतिनिधियों से पूछें—आपने संसद में हमारे भविष्य के लिए क्या किया? जब तक यह सवाल मजबूती से पूछा जाता रहेगा, तब तक लोकतंत्र जीवित रहेगा। *और शायद यही समय की सबसे बड़ी ज़रूरत*
 
 
 
0Shares

Related post

फडणवीस – शिंदे यांच्याकडून फसविल्या गेलेल्या लाडक्या बहिणींच्या नावे खुले पत्र…..! –

फडणवीस – शिंदे यांच्याकडून फसविल्या गेलेल्या लाडक्या बहिणींच्या नावे खुले पत्र…..! –

देवाभाऊ फडणवीस व शिंदे यांच्याकडून फसविल्या गेलेल्या लाडक्या बहिणींच्या नावे खुले पत्र…..! प्रिय लाडक्या बहिणीनो,   …
सरदार पटेलांवर संघ आणि गोलवलकरांचा प्रभाव नसता तर म. गांधींचे प्राण वाचले असते……!

सरदार पटेलांवर संघ आणि गोलवलकरांचा प्रभाव नसता तर म. गांधींचे प्राण वाचले असते……!

सरदार पटेलांवर संघ आणि गोलवलकरांचा प्रभाव नसता तर म. गांधींचे प्राण वाचले असते……!      …
पंडित नेहरू ही थे जिनके वजह काश्मिर मिला, नहीं तो संघ, सावरकर और मुखर्जीने राजा और पाक से सौदा किया था….!

पंडित नेहरू ही थे जिनके वजह काश्मिर मिला, नहीं तो संघ, सावरकर और मुखर्जीने राजा और…

बार बार काश्मीर की चर्चा मुख्य मुद्दों से भागने का सबसे बडा प्रयास…..!      …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *