- 9
- 1 minute read
पंडित नेहरू ही थे जिनके वजह काश्मिर मिला, नहीं तो संघ, सावरकर और मुखर्जीने राजा और पाक से सौदा किया था….!
बार बार काश्मीर की चर्चा मुख्य मुद्दों से भागने का सबसे बडा प्रयास.....!
इस वक्त तो मोदी सरकारने जबाब देना चाहिए की चीनने लडाख और अरुणाचल प्रदेश मे घुसखोरी कैसे की, और तब भारतीय सेना कुछ भी क्यू नहीं कर पायी. मोदी सरकारने जबाब तो उसका भी देना चाहिए की, चौकीदारों ने राम मंदिर को कैसे लुटा, और लूट का माल कहा, कैसे गायब किया. जबाब तो इसका भी देना चाहिए की पेपर लीक कैसे हो रहा है. पश्चिम बंगाल चुनाव की EVM मशीन जलकर राख कैसी हुंई, आंतरराष्ट्रीय बाजार मे डिझेल, पेट्रोल के भाव कम हुये है, तो भी देश के पेट्रोल पंप पे १६९ रुपये लिटर पेट्रोल क्यू बेचा जा रहा है. SIR के माध्यम से जिंदा मतदातायों के नाम क्यू काटे जा रहे है, और बोगस मतदातायों के जोडे क्यू जा रहे है, बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव के वक्त घुसे घुसखोर बाहर निकले है की अंदर ही छुपकर बैठे है, ऐसे बहुत सारे सवाल है, जिसके जबाब देना सरकार का दायित्व है, और देश के १४० करोड जनता का अधिकार….! सरकार मे बैठे जो भी हो, मोदी, अमित शहा क्यू ना हो , जनता के सेवक और जनता मालिक है. मालिक के हर सवाल का जबाब देना सेवक का कर्तव्य ही है. पर सरकार सवालो से भाग रही है. और मुख्य सवालो से जनता का ध्यान भटकाकर काश्मीर का सवाल बार बार उठाकर पंडित नेहरू को बदनाम कर रही है. तो उसका जबाब सुनो, वो नेहरू ही है की, वो थे इसलिये काश्मीर भारत को मिला. नहीं तो संघ , हिंदू महासभा, विनायक सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जीने तो मुस्लिम लीग से मिलकर काश्मीर का सौदा राजा हरिसिंग और पाकिस्तान से किया भी था. सरदार पटेल भी उसके लिये तयार हो गये थे. जिनका गुणगान करके नेहरूजी को निचा दिखाने काम संघ, भाजप और पुरी हिंदुत्ववादी गँग आज कर रही है.
साडे तीन हजार से भी जादा स्वातंत्र्य सैनिक अंदमान के काल कोठरी मे आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे, पर हिंदू महासभा के सर्वेसर्वा विनायक सावरकर के शिवा किसी ने भी ब्रिटिशों के पैर नहीं चाटे, माफी नहीं मांगी. और पेन्शन लेकर ब्रिटिशों की गुलामी नहीं की. शहीद भगतसिंग राजगुरु और बटुकेश्वर दत्त ने देश के मुक्ती के लिये फाशी का फंदा चुना, देश के आजादी के लिये नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व मे आझाद हिंद फौज के सैनिको ने लढना और बलिदान देना पसंत किया. हर कोई देश के लिये लढ रहा था. पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, सावरकर, जीना, लियाकत अली, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और गोलवलकर ही ब्रिटिश सरकार के साथ खडे थे. आजादी के आंदोलन का खुलेआम विरोध कर रहे थे, आंदोलन को दाबने के लिये ब्रिटिश सरकार को मदत कर रहे थे. ब्रिटिश सेना के लिये सैनिक भरती कॅम्प चला रहे थे. यह इतिहास है, और संघ , सावरकर और मुखर्जी का अतित भी है.
भारतीय समाज को हिंदू – मुस्लिम मे बाटकर ब्रिटिश राज कर रहे थे. इसलिये सावरकर के नेतृत्ववाली हिंदू महासभा, हेडगेवार का संघ हो या लियाकत अली, जीना की मुस्लिम लीग हो उनका निर्माण ब्रिटिश सरकारने ही किया है, उनको आर्थिक मदत भी ब्रिटिश ही कर रहे थे. मजेदार बात यह है की, संघ, सावरकर और मुखर्जी हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र के निर्माण की बात कर रहे थे, और अलग राष्ट्र पाकिस्तान की मांग करनेवाले मुस्लिम लीग के साथ पश्चिम बंगाल मे संयुक्त सरकार भी चला रहे थे. यह दोहरी निती केवल आजादी के आंदोलन को विरोध करने के लिये अपनायी गयी थी. वही लोग आज राष्ट्र प्रेम की बात करते है, राष्ट्र भक्ती के प्रमाणपत्र बाट रहे है.
इतिहास गवाह है की, सन 1940 मे मुस्लिम लीग ने देश के विभाजन का मुद्दा उठाकर अलग पाकिस्तान की मांग की. और सन 1941 मे हिंदू महासभा – मुस्लिम लीगने बंगाल मे संयुक्त सरकार बनायी. लियाकत अली के नेतृत्ववाली सरकार मे मुखर्जी मंत्री भी बने. अपने पद का इस्तेमाल करते हुये उन्होंने ब्रिटिश सरकार को वो हर मदत की, जो देश के आजादी के लिये बाधा पैदा कर सकती थी. और जब बटवारा होकर पाक और भारत दोनो देश आजाद हो गये, तब काश्मीर भारत को नहीं मिल पाये, इसलिये बहुत कोशिश इन शक्तियो ने की. पाकिस्तान जैसे काश्मिर भी एक अलग राष्ट्र बने इसके लिये श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सावरकर और गोलवलकर राजा हरिसिंग को उकसा रहे थे. राजा हरिसिंग को सावरकरने कई पत्र लिखे, तो गोलवलकर राजा हरिसिंग के साथ उनके महल मे ही उस वक्त रुके थे. मुखर्जी भी राजा के संपर्क मे थे. पर काश्मीर के काँग्रेस के नेता अब्दुला अब्दुला और नेहरू के दोस्ती ने रंग लाया. तब जाकर काश्मिर भारत का एक अविभाज्य अंग बना है.
काश्मिर को अलग राष्ट्र बनाने के साथ साथ जुनागड और त्रावणकोर के राजायों के संपर्क मे भी सावरकर और मुखर्जी थे.उन्हे भी भारत से अलग करने का प्रयास कर रहे थे. पाकिस्तान के साथ साथ जुनागड, त्रावणकोर को भी अलग राष्ट्र बनाने की योजना यह लोग बना रहे थे. यह कोई हवा हवाई बात है नहीं, उसके डाक्युमेंट उपलब्ध है. इतिहास के पन्नो मे यह लिखा हुआ है. सावरकरने लिखे कई पत्र का उल्लेख समकालीन साहित्य मे मिलता है. पर संघ का ग्लोबल अजेंडा इतना पॉवरफुल था और है की, देश के विभाजन के लिये खुद्द जिम्मेदार होने के बावजुद सारा ठिकरा पंडित जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी के माथेपर फोडने के लिये सावरकर गँग को कामयाबी मिली है. पर आज संघ और मोदी गांधी, नेहरू को जो विरोध कर रहे है, उसका परिणाम यह हुआ है, या हो रहा है की, बुद्धिजीवी लोग इतिहास के पन्नो को फिर से खंगाल रहे है, और उसमे सावरकर, मुखर्जी ही खलनायक बनकर सामने खडे हो रहे है, तो नेहरू नायक, महानायक के रूप मे.
काश्मिर का भारतीय संघ राज्य मे विलय मे नेहरू और अब्दुला अब्दुला की मैत्रीने मुख्य भूमिका निभायी….!
देश आजाद हुआ तब देश मे 700 से आसपास संस्थानिक थे, जो भारतीय संघ राज्य का हिस्सा बनना नहीं चाहते थे, और संघ, हिंदू महासभा सावरकर, मुखर्जी के माध्यम से उन्हे समर्थन भी दे रहे थे. यह सब दस्तावज उपलब्ध है. बात काश्मिर की है, तो पंडित नेहरू खुद्द भी काश्मिरी पंडित थे. इसलिये वो किसी भी स्थिती मे काश्मिर को छोडना नहीं चाहते. और राजा हरिसिंग संघ, हिंदू महासभा के बाहकावे मे आकर भारत मे सामिल होना नहीं चाहते. इस स्थिती मे सरदार पटेल भी नरम पड गये थे. पर देश का स्वर्ग काश्मीर को किसी भी हालात मे नेहरू चाहते थे. इस लिये उन्होंने उस वक्त के काश्मिर के नेता अब्दुला अब्दुला को साथ लाकर काश्मीर का भारत मे विलय किया. पर यह बहुत संघर्ष और लढाई करने के बाद ही संभव हुआ है.
काश्मिर का भारत मे विलय करने के लिये भारतीय सेना और राजा हरिसिंग के बीच युद्ध तक हुये है. और उस युद्ध मे संघ, हिंदू महसभा, गोलवलकर , सावरकर, मुखर्जी देश के साथ नहीं थे, तो राजा हरिसिंग के साथ खडे थे. ये इतिहास है. इसलिये आज के संघ, भाजपा के नेता काश्मीर को लेकर पंडित नेहरू के उपर कुछ भी टीका करो, देश की जनता उनके उपर विश्वास नहीं करेंगे. यह संघ, भाजप को भी मालूम है. पर देश के सामने जो भी समस्या खडी है, और मोदी सरकार की उसके बारे जबाबदेही है, उससे भागाने के लिये संघ, भाजप ये मुद्दे जानबुझकर जनता के बीच मे लाकर छोड देते है. अब भी देश मे फिर से काश्मिर के मुद्दे से नेहरू का नाम जोडकर चर्चा हो रही है, वो भी उसका ही हिस्सा है.
राहुल गायकवाड,
महासचिव, समाजवादी पार्टी,
मुंबई, महाराष्ट्र प्रदेश